Anti-aging: चेहरे की झुर्रियाँ पढने के निम्नलिखित कारण और ईलाज

jhuriyan hatane ka yoga


चेहरे की ( झुर्रियाँ ) : दिन में कई बार दर्पण हम क्यों देखते हैं? कभी सोचा है आपने? शायद आप कहें कि अपने सौन्दर्य को निहारने के लिए और निहारकर सन्तुष्ट होने के लिए कि हम सुन्दर लग रहे हैं? परन्तु सौन्दर्य विशेषज्ञों के नाते मेरा अध्ययन है कि हम आइने में झाँकते हैं चेहरे की जासूसी करने के लिए कि कहीं कोई गड़बड़ी तो नहीं। कोई चेहरे पर दाग-धन्वा या कोई झूरी तो नहीं? चेहरे पर झुर्रियाँ होने पर मनुष्य अपने आप काफी बड़ा दिखने लगता है। झुर्रियाँ उम्र बढ़ने का संकेत हैं, परन्तु प्रारम्भ से ही इस दिशा में सतर्क रहा जाए तो इस अभिशाप से बचाव सम्भव है।
झुर्रियाँ क्या है?

जब त्वचा को सहारा देने वाले टिश्यूज में पाया जाने वाला कोलाजेन तथा लास्टिन फाइबर धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है तो झुर्रियाँ पड़ने लगती हैं चाकी वह सतह जो डर्मिस कहलाती है, जब उम्र के साथ अपना कसाव और तनाव छोड़कर झूलने या ढीली पड़ने लगती है तो झुर्रियाँ पड़ने लगती। जब तक त्वचा में लचीलापन रहता है तब मुस्कराने तथा नाराज होने पर चेहरे पर लकीरें तो पड़ती है, पर पुनः सामान्य होने पर ये मिट जाती हैं और चचा की सतह पुनः स्निग्ध और सपाट लगने लगती है। परन्तु समाप्त होने पर ये लकीरें स्थायी रूप ले लेती हैं।

झुर्रियाँ पड़ने के निम्नलिखित कारण है:-
1. त्वचा के प्रति हमारे दुर्व्यवहार से अर्थात् घटिया साबुन के प्रयोग से एस्ट्रिजेन्ट या इसी तरह के अन्य त्वचा को सुखाने वाले प्रसाधनों के अधिक प्रयोग से और अधिक गर्म पानी के प्रयोग से।

2. अधिक असन्तुलित भोजन के प्रयोग से अस्वस्थ रहने से, नींद पूरी न होने से तथा हर समय तनावग्रस्थ रहने से।

3. बाहरी वातावरण के प्रभाव से अर्थात् कड़ी गर्मी धूप या जाड़े में बिना त्वचा की सुरक्षा किये बाहर निकल जाने से।

कुछ आदतें भी साल-दर-साल पर झुर्रियों के रूप में अपनी छाप छोड़ देती हैं। यदि थोड़ा-सा सावधान रहकर चेहरे को सहज रखा जाये तो अनावश्यक झुर्रियों से बचा जा सकता है। उदाहरण के लिए एक श्रीमति जी शायद बैंक में काम करती हैं। सुबह शाम एक तीन-तेरह से जुझना पड़ सकता है। 

अरे ! प्रत्येक बात पर अचम्भित होते हैं कुछ लोग। हर बात भौहों के उठाकर कहते हैं या सुनते हैं परिणाम माथे पर झुर्रियाँ पड़ सकती हैं। उपचार झुर्रियों से बचाव व उपचार के लिए निम्न बातों पर ध्यान दे होगा। पौष्टिक भोजन करें, पानी का अधिक सेवन करें।

सन बर्न होने पर त्वचा में वैसी ही प्रक्रिया होती है जैसी भाप का तेल आदि से जलने पर होती है। रक्त को शिराएँ सूज जाती हैं और कोष टूट जाते हैं। कम मात्र में सन बर्न होने पर त्वचा दो चार दिन में ठीक जाती है। परन्तु अधिक मात्रा में सन बर्न होने पर त्वचा पर दाने निकल आतेे हैं। दानों के फूटने पर त्वचा की पर्त उतर जाती है। नये कोष बनते है। दुबारा से नयी त्वचा बनती है। लेकिन यह त्वचा अधिक सख्त रूखी और मोटी होती है। इस नयी त्वचा का रंग कत्थई पड़ जाता है। इस नयी त्वच में पड़ी हुई झुर्रियाँ आसानी से ठीक नहीं होतीं।


उपाय : सन बर्न होने पर ठण्डे पानी से नहाने से लाभ होता है। नहाने में साबुन का प्रयोग न करें। फव्वारे के नीचे स्नान करने से विशेष लाभ होता है। सुर्ख त्वचा पर गोले का तेल, कोल्डक्रीम या एण्टी-सैप्टिक क्रीम लगानी चाहिए। लैक्टो केलोमाइन लगाने से भी लाभ मिलता है। सन बर्न होने पर त्वचा के सामान्य होने तक उस पर सूर्य की किरणें नहीं पड़नी चाहिए। त्वचा पर दाने पड़ने पर त्वचा विशेषज्ञ से परामर्श करना चाहिए। जून के माह में सूर्य की किरणें पृथ्वी पर सीधी पड़ती हैं। इसलिए दिन के समय दोपहर बारह से दो बजे तक इन किरणों से बचना चाहिए। इस समय धूप का सामना करने के लिये अधिक मात्रा में नींबू का सेवन करना चाहिए।

श्वेत दाग ( वटिलिगो ) : श्वेत दागों को डॉक्टरी भाषा में ल्यूकोडर्मा कहते हैं। त्वचा में मौजूदा मेलानिन तत्व नष्ट होने पर उस स्थान पर की त्वचा श्वेत ( सफेद ) पड़ जाती है धब्बों का सम्बन्ध त्वचा के रंग पर निर्भर होता है। साँवला त्वचा में मेलोनिन तत्व अधिक होने के कारण अपेक्षाकृत धब्बे अधिक होते हैं। यह कोई वंशानुगत अथवा छूत का रोग नहीं है। श्वेत दागों को रोकने के लिए डॉक्टर दाग के चारों और कार्बोलिक एसिड का घोल लगाने का परामर्श देते है।

आयुर्वेद में तेल से मालिश करने का सुझाव दिया जाता है। निर्यात मल के फलस्वरूप कई बार दाग-दार त्वचा धीरे-धीरे सामान्य का रूप लेने लगती है। प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा भी श्वेत दागों को दूर किया जा सकता है परन्तु यह चिकित्सा अत्यन्त महँगी है।

श्रृंगार द्वारा ये धब्बे अस्थायी रूप से छिपाये जा सकते हैं। त्वचा को भली प्रकार से स्वच्छ करने के उपरान्त पहले फाउण्डेशन लगायें। ध्यान रहे रंग त्वचा के रंग से थोड़ा गहरा हों। तत्पश्चात् फेस पाउडर लगाकर रूज लगायें। रात्रि में सोने से पूर्व शृंगार पूर्णतया साफ कर केलामाइन लोशन लगाने से विशेष लाभ होता है।

सन बर्न : सन बर्न त्वचा के लिए बहुत हानिकारक है। सूर्य आग का एक जलता हुआ गोला है जिससे अनेक प्रकार की किरणें निकलती है। इसके अतिरिक्त इन्फ्रारेड तथा आल्ट्रावायलेट किरणें भी निकलती हैं। जिन्हें हम प्रकट रूप से देखने में असमर्थ हैं। इन्फ्रारेड किरणें गर्म होने के कारण त्वचा के उष्णता प्रदान करती हैं।

अल्ट्रा-वायलेट किरणों से त्वचा को विटामिन डी प्राप्त होता है। यह शरीर का स्वरूप रखने में सहायक है। परन्तु अल्ट्रा-वायलेट किरणें त्वचा पर अधिक मात्रा में पड़ जाने से त्वचा झुलस जाती है। त्वचा के नीचे गहरे मैलानिन त्वचा को झुलसने से बचाते हैं। इस कारण साँवली या काली त्वचा पर सन बर्न का प्रभाव बहुत कम होता है।

सफेद त्वचा पर ये किरणें शीघ्र दुष्प्रभाव डालती हैं। इन किरणों का सबसे अधिक दुष्प्रभाव छ : से आठ वर्ष तक के बच्चों पर पच्चीस से तीन वर्ष के मध्य की महिलाओं तथा तीस से पैंतीस वर्ष के मध्य की आयु वाले पुरुषों पर पड़ता है। अल्ट्रा-वायलेट किरणें त्वचा पर पड़ने से त्वचा का मैलानिन नष्ट किरणें उसे जला देती हैं त्वचा काली पड़ जाती है। जिससे त्वचा सुर्ख होकर सूज जाती है। त्वचा पर दाने निकल आते हैं। नये काले मैलानिन तत्व ऊपर आने लगते हैं और त्वचा काली पड़ जाती है।









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